पिछले दो दिनों में मैने कुछ बहुत ही मुलभुत प्रशन किये अपने अंतर मन से...
हाँ, कुछ समय निकाल पाया अपने चोटिल टांग के कारण..
मेरा पहला प्रशन था मैं कौन हूँ?
प्रशन सुन ने में काफी सरल है मगर ये जान ने में मुझे काफी समय न लगा की इसका उत्तर काफी पेचीदा है और शायद न विज्ञानं और न ही अधाय्तम इसे सही से ढूंड पाया है
सो मैने अपना ध्यान अपने दुसरे प्रशन पर केन्द्रित किया..
मैं क्या कर रहा हूँ? जवाब ने मुझे एक पल के लिए झकझोर दिया...
क्यूँ, आखिर ऐसा क्या हुआ?
मैने पाया की मेरा मैं कहीं गुम हो गया है...काफी आवाज लगाने पे भी वो नहीं मिला...
मैं सोचने लगा की ऐसा क्या हुआ जो उसने मुझे छोड़ने के पहले एक दफा बताया तक नहीं...
ऐसा करते हैं क्या किसी के साथ?
फिर मैं धीरे धीरे अपने आप को टटोलने लगा..मुझे लगा की कुछ न कुछ मैने ऐसा किया है जिस से उसने मुझे छोड़ा...
और इस क्रम में sub से पहले मैने पाया की...
मैं कुछ दिनों से एक सक्श की उधार की ज़िन्दगी जी रहा था॥
जिसकी दौड़ रोज कहीं किसी एक सोसिअल नेटवर्क के एक पन्ने से शुरू होती
और शाम होते होते ये दर्जनों, या किसी अच्छे दिन सैकड़ो पन्नो में शेंद मारने के बाद एक ठंडी सांस लेती थी...
दुनिया में क्या चल रहा है...
दोस्तों की व्यतिगत जीवन की खबर...
कुछ बॉलीवुड कुछ पोलिटिकल गप सप...
कितना कुछ मिल जाता है न समय काटने को..
इन पन्नो की लत बांध लेती है मन को...
पता ही नहीं चला कब मेरा व्यक्तित्व मुझसे निकल कर ऑरकुट और facebook के प्रोफाइल पन्नो में समां गया...
हाँ उसी बाज़ार में जहाँ न जाने कितने चेहरे ऐसे हैं..कल तक अकेले में उसकी साँसों को मैं सुन सकता था,
मगर अब वो कहीं गुम हो गयी है इन असंख्य पन्नो के जाल में...
इन पन्नो में अपने आप को खोजता मैं सोचता हूँ की ये मैं किसकी ज़िन्दगी जी रहा हूँ..
अपनी या फिर एक भीड़ की थोपी हुयी.. जो मुझे चलाये जा रही है...
आज लगता है की उसके साथ का अकेलापन इस कोलाहल में खोने से अच्छा था...
कम से कम मैं खुद को तो जानता था...
मुझे लगता है अपने आस पास से रूबरू होने की दौड़ में अपने आप को खोने से अच्छा है
अपने तन्हाई के साथ होना..खुद को खोने की मुलभुत लड़ाई तो नहीं लड़नी पड़ती...
अमित उपाध्याय
Friday, January 21, 2011
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